I did not know him much, this is how I had to speak about Himanshu(a student of my class in the M.A Previous)  while conducting the condolence meeting for him. Engagement with students for over little less than two decades, you realize  that ‘your students’ are as diverse as the very idea of diversity can offer. Drawn from practically every strata (based on ascribed and achieved status sets), form every ladder of intelligence quotients, you feel that you like some of your students more than others;  many of them are ready converts to your ideas while there are still many who do not agree or align with your position on so many issues, that too so quickly. However, these likes,the agreements and the disagreements, reluctance to accept etc. make the relationship much more complete and gratifying on either side. While talking to your students on a range of concerns; from ‘birth of nation’ to ‘death of community’, you look into their eyes, observe their expressions and imagine them beyond the classroom. And for sure, even in the wildest of imaginations possible, you never envision that your student is ‘framed in’ and a diya with a few incense sticks and flower petals in front……… but that is what happened today and has badly disturbed the individual as well as institutional rhythm at the Department. Sitting there in the auditorium, looking at the colleagues and students you suddenly recognized that the God and his deeds remain under mystic cover forever. A young life, full of umpteen possibilities was just snatched away and explaining it by drawing in ‘God’s will’ is nothing but a fictional consolation. One of my students told the gathering today that he was little leisurely in approaching formal demands such as class or an ICs and his friends and teachers literally pleaded with him to be speedy. And he obliged them and chose quickness of his persona to just disappear.

I did not know him much as I said earlier. Whatever imagination I had been able to draw for him was through my colleagues, particularly from Neera Ma’am. I was told that he had problems with ‘judgement’ and did not want to be judged……. I believe his friends as well as his teachers had conceded to this demand of his and thus nobody ever ‘judged’ him.  But, I am going to disobey my colleagues and shall certainly be judgmental of Himanshu today by pronouncing it loudly, that—It was none of your business to be here, occupy spaces with almost each of the students and the teachers and suddenly call ‘quits’…… I understood and appreciated that you never asked for permission to enter and join the ongoing class, whosoever was the teacher…… that was perfect. But how dare you decided to LEAVE without applying for the same through proper channel.

Advertisements

Image

 

आप इसे आलेख कहें या कुछ और कोई खास फर्क नहीं पड़ता….. सच कहूँ तो भड़ास निकालने की इस अनाम विधा का प्रारूप पिछले कई महीनों से मन के अंदर उमड़-घुमड़ रहा था….. अकादमिक ज़ुबान मे जिसे ब्लूप्रिंट कहता हैं वो तो तैयार था लेकिन इसे ज़िंदा तौर पर उतारने का मौका नहीं मिल रहा था। मध्यम वर्ग का आम तौर पर ‘जागरूक’ इंसान देश और दुनिया के हालात पर अपनी चिंता और पहलकदमी के लिए बड़ा मसरूफ़ रहता है, उसे ये लगता है कि अगर उसने किसी एक दिन या खास तौर पर किसी एक शाम देश के लिए सोचा नहीं तो देश के मिजाज और माहौल का बड़ा नुकसान हो जाएगा। ये प्रजाति विलुप्त होने के बजाय दिनोदिन प्रजनन क्षमता के सिद्धांत को शर्मसार करते हुए बढ़ती ही जा रही है। मैं स्वयं को इस प्रजाति का अभिन्न हिस्सा मानता हूँ… अतः मेरी व्यथा या यूं कहें की मेरी कथा का आगाज इसी प्रजाति के रस्मों-रिवायत से होता है। इस प्रजाति के व्यक्ति की एक और खासियत है कि दिन भर के काम धंधे के बाद घर पहुँचने पर बच्चों और बीवी से हालचाल और उनका मूड जानने से पहले वह देश का मूड जानने की चिंता करता है, अतः मूंह हाथ धोते ही वह टेलीविजन आन करता है।

इस कथा का सिलसिला इन्हीं शामों के साये  में कुछ ऐसे शुरू हुआ……. पिछले कुछ महीनों से एक विचित्र सी चीज हो रही है……. शाम के ढलते ही सारे एलेक्ट्रानिक चैनल पर प्रधानमंत्री बन जाने के धमकी भरे अंदाज़ में एक व्यक्ति( खुद को युग पुरुष मानते हैं )…… रंग बिरंगे कपड़ों मे सजकर अवतरित होते हैं। कमाल है! ये व्यक्ति-विशेष  पूरे देश के मर्म और मन को जान लेने का दावा करते फिर रहा हैं और यह ही नहीं इस दावे के पक्ष में उनके पास आंकड़े भी हैं, ऐसा वो लगातार बताते रहे हैं …. लेकिन वो ‘दिव्य आंकड़े’ सिर्फ युगपुरुषों को उपलब्ध है अतः आप आंकड़ों की बानगी उनसे न पूछिए। वैसे भी टेलेविजन एक-पक्षीय सम्प्रेषण का नायाब माध्यम है अतः गीता दत्तजी के उस गाने(साभार- साहब, बीवी, ग़ुलाम) की तरह, ‘मेरी बात रही मेरे मन में….’, हम सवालों को खड़ा होने से पहले ही बिठा देते हैं। गाल बजाने की अदभूत क्षमता है इस युगपुरुष में और तकनीकी ने तो गाल बजाने की इस कला को नई उचाइयाँ प्रदान कर दी हैं…. देश नीति हो या विदेश नीति, कोयला हो या सोने का मामला, मंहगाई के प्रश्न हो या रुपए की ढलान, ‘मैगी…. दो मिनट बस तैयार’ की तर्ज़ पर इनके पास सारे मामलों का हकीम लुक़मान से बेहतर इलाज़ है। पहले ये बिना शर्म-संकोच के छह करोड़ गुजरातियों के बदले में बोला करते थे लेकिन पश्चात-गोवा के, अब ये बिना लागलपेट या शर्मो-हया के एक सौ बीस या तीस करोड़ हिंदुस्तानयों के बदले में बोलने लगे है। ये मेरे, आपके और हमारे बारे में हमसे ज़्यादा जानने का लगभग दावा प्रतिदिन करने लगे हैं। धंधई आक्रामकता और गुस्से को(असली नकली के भेद में मैं नहीं जाता) आभूषण की तरह ये पहनते हैं और इस आभूषण को खुदरा और थोक में बेचना इनके नागपुरी राष्ट्रवाद का अंतरंग हिस्सा है। और शायद ये ही वजह है कि बड़ी सोची समझी रणनीति के तहत इस गुस्से के अस्सी के दशक के जनक को दरकिनार कर नागपुर के संचालको ने बिक्री की कमान मौजूदा युग पुरुष को सौंप दी। आखिर साख तो इस युग पुरुष ने बनाई ही है……. ‘एक ऐसा राज्य जहां वैष्णव जन तो तैने कहिए…’ की गूंज थी बापू के दिनों से, वहाँ गुस्से और मध्ययुगीन आक्रामकता को खूबसूरती से बेचते हुए तीन चुनाव जीत चुका है….. अतः ईमानदारी की बात यह है कोई दूसरा इस विधा में इस युग पुरुष का दूर दूर तक सानी नहीं है।

तो रही बात मन की कथा की, तो सिर्फ इस गुस्से से प्रतिदिन रूबरू होना ही मेरी पेशानी पर उग आए लगभग पर्मानेंट ‘बल’ का कारण नहीं है। शाम ढलते ही जैसा की मैंने पहले कहा, लगभग सभी चेनल्स इन दिनों इस गुस्से और मध्ययुगीन आक्रामकता को दूकान सजाकर बेचने लगते है। घरेलू और वैश्विक नीतियों पर मतभेद के बरक्स हमारे एंकर महोदय या महोदयागण समान रूप से इस गुस्से को  ‘डिजाइनर’ और ‘आकर्षक’ बनाकर पेश करते हैं। एक एंकर दूसरे से ज़्यादा गुस्से मे दिखता है और सभी समवेत स्वर में अपने आडियन्स से भी उतने ही गुस्से की उम्मीद करते है। ठीक उस युगपुरुष की तरह इन एंकरगण का भी मानना है कि जिसे गुस्सा या क्रोध नहीं हो रहा उसकी ‘राष्ट्रभक्ति’ में कोइ न कोई खोट तो ज़रूर हैं। इस प्रतिस्पर्धी आक्रामकता और गुस्से की लगातार अभिव्यक्ति(बीच के कमर्शियल ब्रेक को छोड़ कर) से कई दफा ये खौफ पैदा होने लगता है कि कहीं इनके ‘शो’ के खत्म होते होते लोग गली-मुहल्लों में एक दूसरे के प्रति इस आक्रामकता का इज़हार करते हुए LOC तक भी न पहुँच जाएं और कहें अपने सैनिकों से, ‘भाई ! लाओ अपनी बंदूक और मशीनगन हमे दो, तुम से नहीं हो रहा, अब हम खुद कर लेंगे’, ‘तुम दो सर नहीं ला पाये, हम (युगपुरुष की उस सहायिका नेत्री के कथन के आलोक में) कम से कम दस सर लाएँगे’।

खैर लोग कर पाएँ या नहीं, लेकिन एक स्वनामधान्य एंकर है, प्रतीत करवाते हैं कि वो लगभग सभी विषयों के ज्ञाता है….. भूगर्भ विज्ञान से लेकर राकेट विज्ञान तक, और क्रिकेट की बारीकियों से लेकर राजनीतिज्ञों की नज़दीकियों पर उनका बराबर का दखल है। ये एंकर महोदय भी ठीक उस युगपुरुष की तरह राष्ट्र की भावनाओं के इकलौते साधक और वाहक हैं। पिछले दौर में एक फिल्म आई थी, ‘अल्बर्ट पिंटों को गुस्सा क्यूँ आता है’, पिंटों को तो शायद किसी खास वजह से गुस्सा आता था, लेकिन इन एंकर साहब को हरेक बात पर आता है—चाहे प्याज की कीमत हो या सरकार की नीयत….’ हर रात नौ या साढ़े नौ बजे पूरा का पूरा देश और उसकी भावनाएं उस पर हावी हो जाती हैं(गाँव देहात में दन्तकथाओं में किसी पर देवी चढ़ जाने के बारे में सुना तो होगा ही), ठीक उसी तर्ज़ पर, इस एंकर पर देश की भावनाएं चढ़ जाती है। और फिर उसके बाद तो इस एंकर के क्रोध और गुस्से के क्या कहने…….डांट और फटकार इनके आथित्य सत्कार का अद्भुत तरीका है…. बेचारे अतिथि राष्ट्र की भावनाओं का सम्मान करते हुए चुपचाप बैठे रहते हैं…. प्राथमिक विद्यालय के उन छात्रों की तरह जो मास्टर साब के गुस्से और कोप से विरोध के बावजूद भी किताब में(कैमरे में!) आंखे गड़ाये पड़े रहते हैं। बीते दिनों मुझे कई बार ये एहसास हुआ की ये तो अच्छा है कि परिष्कृत युद्ध यंत्र जैसे मिसाइल आदि सेना के संरक्षण में रहते है, और आम तौर पर बाज़ार में उपलब्ध नहीं हैं वरना बिना नागा ये एंकर साहब  प्रतिशाम कम से कम दो तीन मिसाइल चीन और पाकिस्तान पर ज़रूर दाग देते।

इन दिनों हमने ये भी देखा है की गुस्सा और आक्रामकता जब विक्रय की आकर्षक वस्तु हो जाती है तो नफरत की तिजारत को कई शेयर होल्डर मिलने लगते है। मेरी मध्यवर्गीय व्यथा का एक पक्ष यह भी है। सेंसेक्स उतना संवेदनशील नहीं है अतः नहीं बताएगा उसे छोड़िए, लेकिन मैं अपने आसपास गली मुहल्लों में ये शेयर खुले आम बिकता देख रहा हूँ और ग़ालिब साहब को याद करता हूँ—‘इंसान के होते हुए इंसान का ये हश्र, देखा नहीं जाता है मगर देख रहा हूँ’।

लेकिन करें क्या! मध्यम वर्ग का आदमी बावजूद तमाम निराशा और कुंठा के, यह मानता है कि, ‘मक़्तबे इश्क़ का दस्तूर निराला देखा, उसको छुट्टी ना मिली जिसने सबक याद किया’ हम ने इस सबक को घुट्टी में पी लिया था कि जिस दिन या शाम हम ने चिंता नहीं की तो तत्क्षण मुल्क का बड़ा नुकसान हो जाएगा। और शायद ये वजह है कि हर शाम मैं आप सबों की तरह टेलीविज़न से दूर नहीं हो रहा और टेलीविज़न इस गुस्से की नुमाइश से दूर नहीं हो रहा। बड़ा ही संकट है भाई, कोई तो बताए कि ‘गुस्से और आक्रमण का ये दौर खत्म होने का नाम क्यूँ नहीं ले रहा’…….. कई संजीदा दोस्तों का कहना है कि 2014 होते ही आक्रमण और गुस्से का यह संक्रमण काल समाप्त हो जाएगा….ज़िंदगी(मेरा मतलब टेलीविज़न से है)फिर से ‘आ चल के तुझे मैं ले के चलूँ…….’ वाले दिनों की और लौट जाएगी। शायद ये वज़ह है कि मैं भी कई लोगों कि तरह 2013 में ही 2014 होते हुए देखना चाहता हूँ। कुछ दोस्त ऐसे भी है, ‘जो कहते है की ना नौ मन तेल होगा और ना राधा नाचेगी’, उनका आशय है कि तेल की पूरी खेप उत्तरप्रदेश में है और वो दोनों नौ मन तेल उपलब्ध नहीं कराएंगे।    

लंगोट धर्म

गाँव के ठीक मुहाने से लगी

एक पुरानी पगडंडीनुमा सड़क पर विशाल लतराता पीपल

और ठीक उसके जड़ से सटी पीर बाबा की मज़ार

या फिर हनुमानजी का चबूतरा

बड़ा ही सहज और स्वीकार्य दृश्य है

और उतना ही सहज है

ऊपर की शाखों पर बंधी मैली-कुचैली मारगांठ से भरी रस्सी पर बेतरतीब सूखते लंगोट

अलग अलग उम्रों, रंगों और आकारों के इन लंगोटों की एका के क्या कहने

किसी हिन्दू लंगोट ने कभी किसी मुस्लिम लंगोट से ये नहीं कहा कि

अबे अधर्मी! दूर हट.. मैं छु जाऊंगा

न ही कभी किसी मुस्लिम लंगोट ने हिन्दू लंगोट को काफिर माना

सहज स्वीकृति की सनातनी परंपरा को शिरोधार्य कर लंगोटों ने कबूला कि

दुनिया के सारे लंगोटों का एक ही धर्म है और यह सब धर्मों का मूल है।      

                                                        

Aside  —  Posted: September 22, 2013 in Uncategorized

जो देखता और भोगता हूँ वही आपको सुनाता हूँ

आप इसे शेर कहें आपकी मर्ज़ी

नफ़रतों की आग में गलियाँ हैं जल रही

आप इसे राष्ट्रप्रेम कहें आपकी मर्ज़ी

नाजी ज़ुबान बोलकर वो दे रहा है ज़ख्म

आप उसे देशभक्त कहें आपकी मर्ज़ी

लहरों की रहनुमाई में हमने सियासत नहीं है की

आप इसे मजबूरी कहें आपकी मर्ज़ी

पूरी सदी का दर्द है मेरे लबे-खामोश पर

आप इसे बेजुबानी कहें आपकी मर्ज़ी

मनोज कुमार झा

चलते नवम्बर की एक दोपहर को….

 

 

अपने कलम की तासीर को मैं खूब समझता हूँ

स्याही सूख जाते ही लिखने को दिल करता है

 

बेशुमार रंजो-गम दुनियादारी की और मसरूफियत दिनभर

फिर भी शाम ढली नही कि अगले दिन का इंतज़ार रहता है

 

अलिफ़ की समझ नही और गुमान पंडिताई का

हमारे दौर में अक्लवालों का कुछ ऐसा ही मिजाज़ रहता है

 

दौर है ज़ुल्मतों का और इल्म की राह आसान नहीं

मगर हर मुसाफिर को हमसफ़र कहने से इत्मीनान रहता है  

 

हिज्र-ओ-विसाल के सुखनवर हुए है ज़माने में बहुत मनोज

कोई ज़माने का भी सुखनवर हो तो एहसास-ए-वफ़ा रहता है      

 

Aside  —  Posted: November 28, 2012 in Uncategorized

बड़ी होती बेटी एक अहसास है
अपनी मान्यताओं और संवेदनाओं को फिर से परखने का
जीवन के उन सूक्ष्म सूत्रों को फिर से पिरोने का
जो बीते बरसों में ना जाने क्यूँ छिटक से गए थे

बड़ी होती बेटी एक दस्तक है
उन दरवाजों को फिर से पोंछकर खोलने का
जिनसे वक्त ने आवाजाही बंद कर दी थी और
जो साल दर साल खुद में रहकर तंग से हो गए थे

बड़ी होती बेटी एक तकाज़ा है
जिंदगी के सरोकारों को फिर से समझने और सहेजने का
क्षितिज को कल्पना में नहीं बल्कि जिंदा आँखों में उतारकर फिर से निहारने का
और इस अहद का कि समर्थ संभावनाएं कभी खत्म नहीं होती.

प्रिय श्री नरेन्द्र मोदीजी

दिल्ली के इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मिडिया के माध्यम से आपके एक के बाद एक, और इस प्रकार से दो ‘खुले पत्रों’ को मुझे पढ़ने का अवसर मिला. हालाँकि यह पत्र मूलतः गुजरात के भाईयों और बहनों को लिखा गया था. अधिवास प्रमाण पत्र रखने के हिसाब से मैं गुजराती नहीं हूँ परन्तु 2002 के नरसंहार के आलोक में मुझे गुजरात के कई जिलों में रहने और काम करने का अवसर मिला. पीडितों के दर्दनाक अनुभवों को जानने और समझने के क्रम में गुजरात के स्याह पन्ने के खिलाफ चल रही लड़ाई में मेरी भी थोड़ी हिस्सेदारी रही है. शायद यही वजह है कि मैं आपके दोनो ही खुले पत्रों में ‘बंद’ भावनाओं को समझने की एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूँ.

माफ कीजियेगा मोदीजी!! आप ‘अनशन’ की बात भी अपने चिर परिचित क्रोध और धमकी भरे अंदाज़ में करते पाए गए हैं और हम चौबीसों घंटे की आक्रामक बाज़रोंउन्मुख मिडिया के इस दौर में एक और अनशन की चर्चा और कवरेज से सिहर से गए हैं. आप ये कहते हैं कि आपका व्रत या अनशन गुजरात राज्य की समृधि और कल्याण के लिए है. ये हमारी समझ से बिल्कुल परे है कि आखिर एक राज्य के मुख्यमंत्री को राज्य कि समृधि और कल्याण के लिए व्रत की शरण में क्यों जाना पड़ता है जबकि इसी राज्य के हजारों लोग बेघर होकर नौ बरस बाद भी अपने ही घर में ‘शरणार्थी’ की तरह रह रहे हैं. अगर उन मजलूमों के दर्द और उनकी पीड़ा तक आप पहुँचने की पहल करते तो शायद यह एक सार्थक कोशिश होती—चोटिल और आहत मानस को हाइ प्रोफाइल व्रत की नही बल्कि सामाजिक राजनीतिक मलहम की आवश्यकता है. आपके उपवास मंच से जिस अंदाज़ में बातें रखी जा रही हैं उस संवाद में सदभावना की भावना तो दूर तक नज़र नहीं आती. माफ कीजियेगा!! शायद मैंने आपके व्रत के निहितार्थ को समझने में भूल की है.
आप, भाजपा और संघ के लोग सर्वोच्य न्यायालय के दिनांक 12 तारीख के फैसले के बाद से ही लोगों को भ्रमित करने में लगे है कि माननीय न्यायालय ने आपको तमाम आरोपों से बरी कर दिया है. आपके उपवास मंच से कई सारे वकील-राजनेता तो न्यायाधीश बनकर आपको क्लीन चिट देने में एक दुसरे से कुश्ती कर रहे हैं. हमारे कई सारे मीडिया के साथी भी इस मामले में बिल्कूल आपकी जुबान बोल रहे हैं और कई टेलीविजन स्टूडियो में एक एक कर आपके दाग धब्बे धोए जा रहे हैं. मैं न्यायशाष्त्र का विशेषज्ञ नहीं हूँ परन्तु इतनी समझ जरुर है कि न्यायालय ने दंड प्रक्रियाओं की आधारभुत मान्यताओं और निष्पक्ष न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है. दुष्प्रचार, गलत सूचना और कोरी अफवाहों के आधार पर आप न्यायिक प्रक्रिया की अवमानना तो कर ही रहे हैं साथ ही हजारों पीडितों की भावनाओं के साथ फिर एक खेल खेल रहें है; यह 2002 के खूनी खेल से कम भयावह नहीं है. यह सुखद है कि इन सबके बावजूद गुजरात के नरसंहार के पीड़ित और गवाह अभी भी मानते हैं कि देर से ही सही न्याय उन्हें मिलेगा. ऐसे माहौल में आपका ‘सदभावना मिशन’ क्या न्यायिक प्रक्रिया और जनसंवेदनाओं के साथ छेड छाड की कोशिश नहीं समझा जाये? कहीं ऐसा तो नहीं कि आप ‘सदभावना’ को ही नए माने दे रहे हैं, जैसा कि आपने ने 2002 में स्वर्गीय न्यूटन के सिद्धांत के साथ किया था? ‘हरेक क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया’ ने ना सिर्फ गुजरात राज्य के सामाजिक नक़्शे को बदला बल्कि हर छोटे बड़े मोहल्लों में बसने वाले लाखो दिलों के बीच खूनी दीवारें खींच दी हैं. मोदीजी! यह गाँधी का गुजरात था जहाँ कि फिजां में ‘वैष्णव जन तो तैने कहिये …’ गूंजता था. क्या कर दिया आपने ‘वैष्णव जनों’ को!
मैं उन लाखों करोड़ों लोगो में से महज एक अदना इंसान हूँ जिसे आपकी ‘ ‘सदभावना मिशन’ से खौफ़ हो रहा है. क्या आप अपने ‘हिन्दुत्व की प्रयोगशाला’ की पद्धति और परिणामों को देश के अन्य हिस्सों में तो नहीं ले जाना चाहते?
आप अपने पत्र में आगे ‘धर्मनिरपेक्ष ताकतों’ को खरी खोटी सुनाते हैं. आपके अनुसार इन ताकतों ने सन 2002 से गुजरात के माहौल को बिगाड़ कर रख दिया है. विडंबना ये है कि आप ‘वातावरण’ के बारे में चिंतित है. लाखो लोगों के दर्द और आंसुओं को दरकिनार कर, उनकी त्रासदी से बेमुख होकर, कोई आप जैसा ही व्यक्ति ऐसा कह सकता है. 2002 की जिस बर्बरता को आप ‘स्वतःस्फूर्त’ और ‘उचित प्रतिहिंसा’ के माध्यम से समझाना चाहते थे, उसने भारतवर्ष के कई साझे सपनों को चकनाचूर कर दिया. साम्प्रदायिकता पहले भी भयावह थी पर आप ने तो 2002 के माध्यम से साम्प्रदायिकता के चरित्र को ही बदल दिया; गुजरात की राजनीतिक सामाजिक चेतना को आप मध्ययुग की बर्बरता के समकक्ष ले गए. हिन्दुतान के मौलिक चरित्र पर आप और आपके संगठन द्वारा किये गए प्रहार से उबरने में अभी काफी वक्त लगेगा और ऐसे माहौल में आपकी ‘आक्रामक सदभावना’ कम से कम मेरी नज़र में तो एक फरेब या यूँ कहूँ कि खौफनाक तिलिस्म ही महसूस हो रहा है.
लेकिन मुझे आपका लोहा मानना ही पड़ेगा, आपने अपने कुटिल कौशल से हम सभी; चाहे आपके राजनितिक विरोधी हों या मुझ जैसे धर्मनिरपेक्ष लोगों को पछाड दिया है. जब हम आपकी राजनीति पर पर्चे लिख रहे थे या पोस्टर चिपका रहे थे, आप और आपका संगठन लोगों के मानस बदलने में संलग्न था. आपने गुजरात की सामाजिक राजनीतिक शब्दावली और विकास के मुहावरे ही बदल दिए. यह कष्टकर है कि गाँधी के राज्य के सामाजिक ताने बाने के साथ इस जघन्य बलात्कार के हम सब मूक गवाह बनकर रह गए है. आप ‘छह करोड गुजरातियों’ के पर्याय के रूप में खुद को प्रस्तुत करते हैं और हम शर्मसार होने के अलावा कुछ बिगाड़ नहीं पाते आपका.
आप अपने पत्र में, अपनी राजनीति के ठीक विपरीत गुजरात के लोगों से ये कहते हैं कि, ‘नफरत से नफरत पर विजय नहीं पायी जा सकती’ और उनसे ये भी कहते हैं कि, ‘विविधता में एकता’ भारत की आत्मा है. मुझे विश्वास है कि आपके ‘खुले पत्र’ के लाखों पाठक आपसे पूछना चाहेंगे कि उपरोक्त अवधारणा में क्या आपका रत्ती भर भी भरोसा है? क्या आपने अपने राजनीतिक जीवन में इस पर कभी अमल किया है? कुछ का यह भी मानना है कि भाजपा में शीर्ष नेतृत्व के लिए अपनी दावेदारी के लिए आप विविधता में एकता का राग अलाप रहें हैं. धर्मनिरपेक्ष हूँ अतः, बिना मांगे एक सलाह देने कि गुस्ताखी करना चाहता हूँ: सार्वजनिक जीवन में कोई भी ऐसा वादा या आश्वाशन ना दें, जिसकी इजाजत आपका राजनीतिक दर्शन और स्वाभाव नहीं देता.
इतना सब कहने के बाद भी, राष्ट्रपिता कुछ संकेत से देते प्रतीत हो रहें हैं, चाहता हूँ कि किसी भी प्रकार दिल ये माने कि शायद इस बार आप सामाजिक सदभाव के लिए सचमुच प्रतिबद्ध हैं. फिर ये ख्याल भी आता है कि आपसे कहूँ कि इसके लिए अन्न से दूर रहने के बजाय आपको एक और पत्र लिखना चाहिए था. अभी भी देर नहीं हुई है मुख्यमंत्रीजी! सिर्फ एक लाइन का पत्र लिख डालिए गुजरात के लोगों से और साथ ही हिंदुस्तान की आत्मा से कहिये—‘ में अपने व्यवहार के लिए शर्मिन्दा हूँ’. बहुत बड़ा दिल हैं हिन्दुस्तान और हिंदुस्तानियों का, आप कह के तो देखिये.
आपका
मनोज कुमार झा
आपके के कटाक्षों के बावजूद एक धर्मनिरपेक्ष हिन्दुस्तानी